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Posts Tagged ‘kavitaye’

क्या यही मनुज है ?

Posted by Sandesh Dixit on January 18, 2009

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अधीर अधर पर राम प्रकट है ,
व्यथा विकट या काल निकट है

सबल हाथ ,जग सकल साथ है ,
निर्बल ही को बस जग्गंनाथ है .

जीत का अब उन्माद थका है ,
थके हार कटु स्वाद चखा है .

जब तक था माया का साया ,सहज कभी तू याद न आया ,
पर जब सूर्य ढला और तुम गहराया , ह्रदय ओअत में प्रभु नाम समाया .

भक्ति का संगीत नहीं ये दुह-वक्त की चीत्कार है ,
दे शरण कर दुख हरण ये तट नहीं मंझधार है .

धन जीवन ,मन मोह बंधन ,सखा यही बस यही अनुज है ,
आजीवन संचय में मगन ,छल लोभ स्वार्थ ,क्या यही मनुज है ?

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धरम अर्थ समझाऊ क्या

Posted by Sandesh Dixit on January 18, 2009

जो रक्त से सना नहीं ,जो रक्त में बहा नहीं
उसे रंगे-खून दिखाऊ क्या
उसे धरम अर्थ समझाऊ क्या

जिन्हें न मतलब ध्यान से
न गीता से ,न कुरान से
उसे वेद पुराण पड़ाउ क्या
उसे धरम अर्थ समझाऊ क्या

जिसमें भावः न ,न भक्ति है
न सुनने की ही सकती है
उसे मंत्र श्लोक सुनु क्या
उसे धरम अर्थ समझाऊ क्या

जो कुतर्को से भरे पड़े
पाश्चात्य में रंगे पड़े
उन्हें तर्क वितर्क बुझाऊ क्या
उसे धरम अर्थ समझाऊ क्या

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कैसे भूलू

Posted by Sandesh Dixit on January 18, 2009

forget
कैसे भूलू , वो नैनो की भाषा ,वो चंचल अभिलाषा
वो तेरा शरमाना,आँखे झुका के यू मुस्काना
फिर कान में आकर धीरे से कहना , की तुम्हे मोहब्बत है
तुम्ही बतलाओ मुझे ….कैसे भूलू

कैसे भूलू ,जब तेरे कदमो की आहट से मेरा दिल दहलता था
तेरी एक नज़र के लीए वो इस तरह मचलता था
हर हवा में तेरी खुशबु ,हर फिजा में तेरे नज़ारे ,शायद वक़्त भी तेरे इशारे पे चलता था
कैसे भूलू उस खुशबु को जो आज भी मेरी सांसो में बसती है
तुम्ही बतलाओ मुझे ….कैसे भूलू

कैसे भूलू बारिस की उन बूंदों को ,जो आज भी तेरे प्यार में भिगोती है
उन फूलो की पंखुडियों को .जो डायरी के पन्ने आज भी सजोती है
कैसे भूलू , तेरे सुर्ख होठो से सने खतो को , जो आज भी तेरे होने की गवाही देते है
इन एहसासों से भरी यादो को कैसे भूलू
तुम्ही बतलाओ मुझे …. कैसे भूलू ..कैसे भूलू

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मुर्ग़ी और नेता

Posted by Sandesh Dixit on January 17, 2009

नेता अखरोट से बोले किसमिस लाल

हुज़ूर हल कीजिये मेरा एक सवाल

मेरा एक सवाल, समझ में बात न भरती

मुर्ग़ी अंडे के ऊपर क्यों बैठा करती

नेता ने कहा, प्रबंध शीघ्र ही करवा देंगे

मुर्ग़ी के कमरे में एक कुर्सी डलवा देंगे

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तेली कौ ब्याह

Posted by Sandesh Dixit on January 17, 2009

भोलू तेली गाँव में, करै तेल की सेल
गली-गली फेरी करै, ‘तेल लेऊ जी तेल’
‘तेल लेऊ जी तेल’, कड़कड़ी ऐसी बोली
बिजुरी तड़कै अथवा छूट रही हो गोली
कहँ काका कवि कछुक दिना सन्नाटौ छायौ
एक साल तक तेली नहीं गाँव में आयो

मिल्यौ अचानक एक दिन, मरियल बा की चाल
काया ढीली पिलपिली, पिचके दोऊ गाल
पिचके दोऊ गाल, गैल में धक्का खावै
‘तेल लेऊ जी तेल’, बकरिया सौ मिमियावै
पूछी हमने जे कहा हाल है गयौ तेरौ
भोलू बोलो, काका ब्याह है गयौ मेरौ

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पिल्ला

Posted by Sandesh Dixit on January 17, 2009

पिल्ला बैठा कार में, मानुष ढोवें बोझ

भेद न इसका मिल सका, बहुत लगाई खोज

बहुत लगाई खोज, रोज़ साबुन से न्हाता

देवी जी के हाथ, दूध से रोटी खाता

कहँ ‘काका’ कवि, माँगत हूँ वर चिल्ला-चिल्ला

पुनर्जन्म में प्रभो! बनाना हमको पिल्ला

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पंचभूत

Posted by Sandesh Dixit on January 17, 2009

भाँड़, भतीजा, भानजा, भौजाई, भूपाल

पंचभूत की छूत से, बच व्यापार सम्हाल

बच व्यापार सम्हाल, बड़े नाज़ुक ये नाते

इनको दिया उधार, समझ ले बट्टे खाते

‘काका ‘ परम प्रबल है इनकी पाचन शक्ती

जब माँगोगे, तभी झाड़ने लगें दुलत्ती

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मोटी पत्नी

Posted by Sandesh Dixit on January 17, 2009

ढाई मन से कम नहीं, तौल सके तो तौल

किसी-किसी के भाग्य में, लिखी ठौस फ़ुटबौल

लिखी ठौस फ़ुटबौल, न करती घर का धंधा

आठ बज गये किंतु पलंग पर पड़ा पुलंदा

कहँ ‘ काका ‘ कविराय , खाय वह ठूँसमठूँसा

यदि ऊपर गिर पड़े, बना दे पति का भूसा

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सुरा समर्थन

Posted by Sandesh Dixit on January 17, 2009

भारतीय इतिहास का, कीजे अनुसंधान

देव-दनुज-किन्नर सभी, किया सोमरस पान

किया सोमरस पान, पियें कवि, लेखक, शायर

जो इससे बच जाये, उसे कहते हैं ‘कायर’

कहँ ‘काका’, कवि ‘बच्चन’ ने पीकर दो प्याला

दो घंटे में लिख डाली, पूरी ‘मधुशाला’

भेदभाव से मुक्त यह, क्या ऊँचा क्या नीच

अहिरावण पीता इसे, पीता था मारीच

पीता था मारीच, स्वर्ण- मृग रूप बनाया

पीकर के रावण सीता जी को हर लाया

कहँ ‘काका’ कविराय, सुरा की करो न निंदा

मधु पीकर के मेघनाद पहुँचा किष्किंधा

ठेला हो या जीप हो, अथवा मोटरकार

ठर्रा पीकर छोड़ दो, अस्सी की रफ़्तार

अस्सी की रफ़्तार, नशे में पुण्य कमाओ

जो आगे आ जाये, स्वर्ग उसको पहुँचाओ

पकड़ें यदि सार्जेंट, सिपाही ड्यूटी वाले

लुढ़का दो उनके भी मुँह में, दो चार पियाले

पूरी बोतल गटकिये, होय ब्रह्म का ज्ञान

नाली की बू, इत्र की खुशबू एक समान

खुशबू एक समान, लड़्खड़ाती जब जिह्वा

‘डिब्बा’ कहना चाहें, निकले मुँह से ‘दिब्बा’

कहँ ‘काका’ कविराय, अर्ध-उन्मीलित अँखियाँ

मुँह से बहती लार, भिनभिनाती हैं मखियाँ

प्रेम-वासना रोग में, सुरा रहे अनुकूल

सैंडिल-चप्पल-जूतियां, लगतीं जैसे फूल

लगतीं जैसे फूल, धूल झड़ जाये सिर की

बुद्धि शुद्ध हो जाये, खुले अक्कल की खिड़की

प्रजातंत्र में बिता रहे क्यों जीवन फ़ीका

बनो ‘पियक्कड़चंद’, स्वाद लो आज़ादी का

एक बार मद्रास में देखा जोश-ख़रोश

बीस पियक्कड़ मर गये, तीस हुये बेहोश

तीस हुये बेहोश, दवा दी जाने कैसी

वे भी सब मर गये, दवाई हो तो ऐसी

चीफ़ सिविल सर्जन ने केस कर दिया डिसमिस

पोस्ट मार्टम हुआ, पेट में निकली ‘वार्निश’

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घूस माहात्म्य

Posted by Sandesh Dixit on January 17, 2009

भी घूस खाई नहीं, किया न भ्रष्टाचार

ऐसे भोंदू जीव को बार-बार धिक्कार

बार-बार धिक्कार, व्यर्थ है वह व्यापारी

माल तोलते समय न जिसने डंडी मारी

कहँ ‘काका’, क्या नाम पायेगा ऐसा बंदा

जिसने किसी संस्था का, न पचाया चंदा

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