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जाने के ये खबर उसे कोई….

Posted by Sandesh Dixit on September 20, 2009

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चुभे है तीर सा,जब न मिले है जवाब उनसे
वो असल मैं है मशरूफ, या दर्द बेखबर उसे कोई?

मेरी बातो की तड़प का अंदाजा उसे नहीं शायद
मेरे लफ्जो को समझे भी, या इनकार उसे कोई ?

वो सोचे है के जिंदगी मैं गहरायी है बड़ी
मुझे न कल की खबर,जाने के ये खबर उसे कोई ?

बहुत हुई कोशिश उसके दो लफ्ज़ पाने की
अब तो शक !! के वो दिल है,या दिया पत्थर उसे कोई ?

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ये जरुरी तो नही

Posted by Sandesh Dixit on January 18, 2009

मेरे हर लब्ज़ शब्दों में बया हो , ये जरुरी तो नही ,
दिल के हर जज्बात आँखों में समां हो , ये जरुरी तो नही ,

मुमंकिन है हर दर्द को दिल में छुपाना भी
हर रिसते ‘अश्क’ से भीगे पलके , ये जरुरी तो नही ,

जिसकी मोहब्बत में ,मैं कुछ भी कर गुजर जाऊंगा
उसे भी मुझ पर हो इतना यकीं ,ये जरुरी तो नही ,

जिसकी यादो में , मैं रात भर सोया नही शायद
उसके ख्वाबो में भी हो मेरा इन्तजार ,ये जरुरी तो नही,

हर वक्त खायी थी जिसने साथ मरने की कसमें
वो दे जिंदगी में भी साथ , ये जरुरी तो नही …..

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क्या यही मनुज है ?

Posted by Sandesh Dixit on January 18, 2009

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अधीर अधर पर राम प्रकट है ,
व्यथा विकट या काल निकट है

सबल हाथ ,जग सकल साथ है ,
निर्बल ही को बस जग्गंनाथ है .

जीत का अब उन्माद थका है ,
थके हार कटु स्वाद चखा है .

जब तक था माया का साया ,सहज कभी तू याद न आया ,
पर जब सूर्य ढला और तुम गहराया , ह्रदय ओअत में प्रभु नाम समाया .

भक्ति का संगीत नहीं ये दुह-वक्त की चीत्कार है ,
दे शरण कर दुख हरण ये तट नहीं मंझधार है .

धन जीवन ,मन मोह बंधन ,सखा यही बस यही अनुज है ,
आजीवन संचय में मगन ,छल लोभ स्वार्थ ,क्या यही मनुज है ?

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धरम अर्थ समझाऊ क्या

Posted by Sandesh Dixit on January 18, 2009

जो रक्त से सना नहीं ,जो रक्त में बहा नहीं
उसे रंगे-खून दिखाऊ क्या
उसे धरम अर्थ समझाऊ क्या

जिन्हें न मतलब ध्यान से
न गीता से ,न कुरान से
उसे वेद पुराण पड़ाउ क्या
उसे धरम अर्थ समझाऊ क्या

जिसमें भावः न ,न भक्ति है
न सुनने की ही सकती है
उसे मंत्र श्लोक सुनु क्या
उसे धरम अर्थ समझाऊ क्या

जो कुतर्को से भरे पड़े
पाश्चात्य में रंगे पड़े
उन्हें तर्क वितर्क बुझाऊ क्या
उसे धरम अर्थ समझाऊ क्या

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कैसे भूलू

Posted by Sandesh Dixit on January 18, 2009

forget
कैसे भूलू , वो नैनो की भाषा ,वो चंचल अभिलाषा
वो तेरा शरमाना,आँखे झुका के यू मुस्काना
फिर कान में आकर धीरे से कहना , की तुम्हे मोहब्बत है
तुम्ही बतलाओ मुझे ….कैसे भूलू

कैसे भूलू ,जब तेरे कदमो की आहट से मेरा दिल दहलता था
तेरी एक नज़र के लीए वो इस तरह मचलता था
हर हवा में तेरी खुशबु ,हर फिजा में तेरे नज़ारे ,शायद वक़्त भी तेरे इशारे पे चलता था
कैसे भूलू उस खुशबु को जो आज भी मेरी सांसो में बसती है
तुम्ही बतलाओ मुझे ….कैसे भूलू

कैसे भूलू बारिस की उन बूंदों को ,जो आज भी तेरे प्यार में भिगोती है
उन फूलो की पंखुडियों को .जो डायरी के पन्ने आज भी सजोती है
कैसे भूलू , तेरे सुर्ख होठो से सने खतो को , जो आज भी तेरे होने की गवाही देते है
इन एहसासों से भरी यादो को कैसे भूलू
तुम्ही बतलाओ मुझे …. कैसे भूलू ..कैसे भूलू

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इक लफ़्ज़े-मोहब्बत का

Posted by Sandesh Dixit on January 17, 2009

इक लफ़्ज़े-मोहब्बत का अदना सा फ़साना है
सिमटे तो दिल-ए-आशिक़ फैले तो ज़माना है
ये किस का तसव्वुर है ये किस का फ़साना है
जो अश्क है आँखों में तस्बीह का दाना है
हम इश्क़ के मारों का इतना ही फ़साना है
रोने को नहीं कोई हँसने को ज़माना है
वो और वफ़ा-दुश्मन मानेंगे न माना है
सब दिल की शरारत है आँखों का बहाना है
क्या हुस्न ने समझा है क्या इश्क़ ने जाना है
हम ख़ाक-नशीनों की ठोकर में ज़माना है
वो हुस्न-ओ-जमाल उन का ये इश्क़-ओ-शबाब अपना
जीने की तमन्ना है मरने का ज़माना है
या वो थे ख़फ़ा हम से या हम थे ख़फ़ा उन से
कल उन का ज़माना था आज अपना ज़माना है
अश्कों के तबस्सुम में आहों के तरन्नुम में
मासूम मोहब्बत का मासूम फ़साना है
आँखों में नमी सी है चुप-चुप से वो बैठे हैं
नाज़ुक सी निगाहों में नाज़ुक सा फ़साना है
है इश्क़-ए-जुनूँ-पेशा हाँ इश्क़-ए-जुनूँ-पेशा
आज एक सितमगर को हँस हँस के रुलाना है
ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना तो समझ लीजे
एक आग का दरिया है और डूब के जाना है
आँसू तो बहोत से हैं आँखों में ‘जिगर’ लेकिन
बिंध जाये सो मोती है रह जाये सो दाना है

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हर दम दुआएँ देना

Posted by Sandesh Dixit on January 17, 2009

हर दम दुआएँ देना हर लम्हा आहें भरना
इन का भी काम करना अपना भी काम करना
याँ किस को है मय्यसर ये काम कर गुज़रना
एक बाँकपन पे जीना एक बाँकपन पे मरना
जो ज़ीस्त को न समझे जो मौत को न जाने
जीना उंहीं का जीना मरना उंहीं का मरना
हरियाली ज़िन्दगी पे सदक़े हज़ार जाने
मुझको नहीं गवारा साहिल की मौत मरना
रंगीनियाँ नहीं तो रानाइयाँ भी कैसी
शबनम सी नाज़नीं को आता नहीं सँवरना
तेरी इनायतों से मुझको भी आ चला है
तेरी हिमायतों में हर-हर क़दम गुज़रना
कुछ आ चली है आहट इस पायनाज़ की सी
तुझ पर ख़ुदा की रहमत ऐ दिल ज़रा ठहरना
ख़ून-ए-जिगर का हासिल इक शेर तक की सूरत
अपना ही अक्स जिस में अपना ही रंग भरना

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साक़ी की हर निगाह पे बल खा के पी गया

Posted by Sandesh Dixit on January 17, 2009

साक़ी की हर निगाह पे बल खा के पी गया
लहरों से खेलता हुआ लहरा के पी गया
बेकैफ़ियों के कैफ़ से घबरा के पी गया
तौबा को तोड़-तोड़ के थर्रा के पी गया
ज़ाहिद ये मेरी शोखी-ए-रिनदाना देखना
रेहमत को बातों-बातों में बहला के पी गया
सरमस्ती-ए-अज़ल मुझे जब याद आ गई
दुनिया-ए-ऎतबार को ठुकरा के पी गया
आज़ुर्दगी ए खा‍तिर-ए-साक़ी को देख कर
मुझको वो शर्म आई के शरमा के पी गया
ऎ रेहमते तमाम मेरी हर ख़ता मुआफ़
मैं इंतेहा-ए-शौक़ में घबरा के पी गया
पीता बग़ैर इज़्न ये कब थी मेरी मजाल
दरपरदा चश्म-ए-यार की शेह पा के पी गया
इस जाने मयकदा की क़सम बारहा जिगर
कुल आलम-ए-बसीत पर मैं छा के पी गया

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तेरी खुशी से अगर गम में भी खुशी न हुई

Posted by Sandesh Dixit on January 17, 2009

तेरी खुशी से अगर गम में भी खुशी न हुई Teri Khushi se Agar gam mein bhi

Edit

तेरी खुशी से अगर गम में भी खुशी न हुई
वोह ज़िंदगी तो मुहब्बत की ज़िंदगी न हुई!
कोई बढ़े न बढ़े हम तो जान देते हैं
फिर ऐसी चश्म-ए-तवज्जोह कभी हुई न हुई!
तमाम हर्फ़-ओ-हिकायत तमाम दीदा-ओ-दिल
इस एह्तेमाम पे भी शरह-ए-आशिकी न हुई
सबा यह उन से हमारा पयाम कह देना
गए हो जब से यहां सुबह-ओ-शाम ही न हुई
इधर से भी है सिवा कुछ उधर की मजबूरी
की हमने आह तो की उनसे आह भी न हुई
ख़्याल-ए-यार सलामत तुझे खुदा रखे
तेरे बगैर कभी घर में रोशनी न हुई
गए थे हम भी जिगर जलवा-गाह-ए-जानां में
वोह पूछते ही रहे हमसे बात ही न हुई

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कहाँ से बढ़कर पहुँचे हैं

Posted by Sandesh Dixit on January 17, 2009

कहाँ से बढ़कर पहुँचे हैं कहाँ तक इल्म-ओ-फ़न साक़ी
मगर आसूदा इनसाँ का न तन साक़ी न मन साक़ी
ये सुनता हूँ कि प्यासी है बहुत ख़ाक-ए-वतन साक़ी
ख़ुदा हाफ़िज़ चला मैं बाँधकर सर से कफ़न साक़ी
सलामत तू तेरा मयख़ाना तेरी अंजुमन साक़ी
मुझे करनी है अब कुछ खि़दमत-ए-दार-ओ-रसन साक़ी
रग-ओ-पै में कभी सेहबा ही सेहबा रक़्स करती थी
मगर अब ज़िन्दगी ही ज़िन्दगी है मोजज़न साक़ी
न ला विश्वास दिल में जो हैं तेरे देखने वाले
सरे मक़तल भी देखेंगे चमन अन्दर चमन साक़ी
तेरे जोशे रक़ाबत का तक़ाज़ा कुछ भी हो लेकिन
मुझे लाज़िम नहीं है तर्क-ए-मनसब दफ़अतन साक़ी
अभी नाक़िस है मयआर-ए-जुनु, तनज़ीम-ए-मयख़ाना
अभी नामोतबर है तेरे मसतों का चलन साक़ी
वही इनसाँ जिसे सरताज-ए-मख़लूक़ात होना था
वही अब सी रहा है अपनी अज़मत का कफ़न साक़ी
लिबास-ए-हुर्रियत के उड़ रहे हैं हर तरफ़ पुरज़े
लिबास-ए-आदमीयत है शिकन अन्दर शिकन साक़ी
मुझे डर है कि इस नापाकतर दौर-ए-सियासत में
बिगड़ जाएँ न खुद मेरा मज़ाक़े शेर ओ फ़न साक़ी

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