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Archive for the ‘Kaka Hathrasi’ Category

मुर्ग़ी और नेता

Posted by Sandesh Dixit on January 17, 2009

नेता अखरोट से बोले किसमिस लाल

हुज़ूर हल कीजिये मेरा एक सवाल

मेरा एक सवाल, समझ में बात न भरती

मुर्ग़ी अंडे के ऊपर क्यों बैठा करती

नेता ने कहा, प्रबंध शीघ्र ही करवा देंगे

मुर्ग़ी के कमरे में एक कुर्सी डलवा देंगे

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तेली कौ ब्याह

Posted by Sandesh Dixit on January 17, 2009

भोलू तेली गाँव में, करै तेल की सेल
गली-गली फेरी करै, ‘तेल लेऊ जी तेल’
‘तेल लेऊ जी तेल’, कड़कड़ी ऐसी बोली
बिजुरी तड़कै अथवा छूट रही हो गोली
कहँ काका कवि कछुक दिना सन्नाटौ छायौ
एक साल तक तेली नहीं गाँव में आयो

मिल्यौ अचानक एक दिन, मरियल बा की चाल
काया ढीली पिलपिली, पिचके दोऊ गाल
पिचके दोऊ गाल, गैल में धक्का खावै
‘तेल लेऊ जी तेल’, बकरिया सौ मिमियावै
पूछी हमने जे कहा हाल है गयौ तेरौ
भोलू बोलो, काका ब्याह है गयौ मेरौ

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पिल्ला

Posted by Sandesh Dixit on January 17, 2009

पिल्ला बैठा कार में, मानुष ढोवें बोझ

भेद न इसका मिल सका, बहुत लगाई खोज

बहुत लगाई खोज, रोज़ साबुन से न्हाता

देवी जी के हाथ, दूध से रोटी खाता

कहँ ‘काका’ कवि, माँगत हूँ वर चिल्ला-चिल्ला

पुनर्जन्म में प्रभो! बनाना हमको पिल्ला

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पंचभूत

Posted by Sandesh Dixit on January 17, 2009

भाँड़, भतीजा, भानजा, भौजाई, भूपाल

पंचभूत की छूत से, बच व्यापार सम्हाल

बच व्यापार सम्हाल, बड़े नाज़ुक ये नाते

इनको दिया उधार, समझ ले बट्टे खाते

‘काका ‘ परम प्रबल है इनकी पाचन शक्ती

जब माँगोगे, तभी झाड़ने लगें दुलत्ती

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मोटी पत्नी

Posted by Sandesh Dixit on January 17, 2009

ढाई मन से कम नहीं, तौल सके तो तौल

किसी-किसी के भाग्य में, लिखी ठौस फ़ुटबौल

लिखी ठौस फ़ुटबौल, न करती घर का धंधा

आठ बज गये किंतु पलंग पर पड़ा पुलंदा

कहँ ‘ काका ‘ कविराय , खाय वह ठूँसमठूँसा

यदि ऊपर गिर पड़े, बना दे पति का भूसा

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सुरा समर्थन

Posted by Sandesh Dixit on January 17, 2009

भारतीय इतिहास का, कीजे अनुसंधान

देव-दनुज-किन्नर सभी, किया सोमरस पान

किया सोमरस पान, पियें कवि, लेखक, शायर

जो इससे बच जाये, उसे कहते हैं ‘कायर’

कहँ ‘काका’, कवि ‘बच्चन’ ने पीकर दो प्याला

दो घंटे में लिख डाली, पूरी ‘मधुशाला’

भेदभाव से मुक्त यह, क्या ऊँचा क्या नीच

अहिरावण पीता इसे, पीता था मारीच

पीता था मारीच, स्वर्ण- मृग रूप बनाया

पीकर के रावण सीता जी को हर लाया

कहँ ‘काका’ कविराय, सुरा की करो न निंदा

मधु पीकर के मेघनाद पहुँचा किष्किंधा

ठेला हो या जीप हो, अथवा मोटरकार

ठर्रा पीकर छोड़ दो, अस्सी की रफ़्तार

अस्सी की रफ़्तार, नशे में पुण्य कमाओ

जो आगे आ जाये, स्वर्ग उसको पहुँचाओ

पकड़ें यदि सार्जेंट, सिपाही ड्यूटी वाले

लुढ़का दो उनके भी मुँह में, दो चार पियाले

पूरी बोतल गटकिये, होय ब्रह्म का ज्ञान

नाली की बू, इत्र की खुशबू एक समान

खुशबू एक समान, लड़्खड़ाती जब जिह्वा

‘डिब्बा’ कहना चाहें, निकले मुँह से ‘दिब्बा’

कहँ ‘काका’ कविराय, अर्ध-उन्मीलित अँखियाँ

मुँह से बहती लार, भिनभिनाती हैं मखियाँ

प्रेम-वासना रोग में, सुरा रहे अनुकूल

सैंडिल-चप्पल-जूतियां, लगतीं जैसे फूल

लगतीं जैसे फूल, धूल झड़ जाये सिर की

बुद्धि शुद्ध हो जाये, खुले अक्कल की खिड़की

प्रजातंत्र में बिता रहे क्यों जीवन फ़ीका

बनो ‘पियक्कड़चंद’, स्वाद लो आज़ादी का

एक बार मद्रास में देखा जोश-ख़रोश

बीस पियक्कड़ मर गये, तीस हुये बेहोश

तीस हुये बेहोश, दवा दी जाने कैसी

वे भी सब मर गये, दवाई हो तो ऐसी

चीफ़ सिविल सर्जन ने केस कर दिया डिसमिस

पोस्ट मार्टम हुआ, पेट में निकली ‘वार्निश’

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घूस माहात्म्य

Posted by Sandesh Dixit on January 17, 2009

भी घूस खाई नहीं, किया न भ्रष्टाचार

ऐसे भोंदू जीव को बार-बार धिक्कार

बार-बार धिक्कार, व्यर्थ है वह व्यापारी

माल तोलते समय न जिसने डंडी मारी

कहँ ‘काका’, क्या नाम पायेगा ऐसा बंदा

जिसने किसी संस्था का, न पचाया चंदा

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पुलिस-महिमा

Posted by Sandesh Dixit on January 17, 2009

पड़ा – पड़ा क्या कर रहा , रे मूरख नादान

दर्पण रख कर सामने , निज स्वरूप पहचान

निज स्वरूप पह्चान , नुमाइश मेले वाले

झुक – झुक करें सलाम , खोमचे – ठेले वाले

कहँ ‘ काका ‘ कवि , सब्ज़ी – मेवा और इमरती

चरना चाहे मुफ़्त , पुलिस में हो जा भरती

कोतवाल बन जाये तो , हो जाये कल्यान

मानव की तो क्या चले , डर जाये भगवान

डर जाये भगवान , बनाओ मूँछे ऐसीं

इँठी हुईं , जनरल अयूब रखते हैं जैसीं

कहँ ‘ काका ‘, जिस समय करोगे धारण वर्दी

ख़ुद आ जाये ऐंठ – अकड़ – सख़्ती – बेदर्दी

शान – मान – व्यक्तित्व का करना चाहो विकास

गाली देने का करो , नित नियमित अभ्यास

नित नियमित अभ्यास , कंठ को कड़क बनाओ

बेगुनाह को चोर , चोर को शाह बताओ

‘ काका ‘, सीखो रंग – ढंग पीने – खाने के

‘ रिश्वत लेना पाप ‘ लिखा बाहर थाने के

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हिंदी की दुर्दशा

Posted by Sandesh Dixit on January 17, 2009

बटुकदत्त से कह रहे, लटुकदत्त आचार्य

सुना? रूस में हो गई है हिंदी अनिवार्य

है हिंदी अनिवार्य, राष्ट्रभाषा के चाचा-

बनने वालों के मुँह पर क्या पड़ा तमाचा

कहँ ‘ काका ‘ , जो ऐश कर रहे रजधानी में

नहीं डूब सकते क्या चुल्लू भर पानी में

पुत्र छदम्मीलाल से, बोले श्री मनहूस

हिंदी पढ़नी होये तो, जाओ बेटे रूस

जाओ बेटे रूस, भली आई आज़ादी

इंग्लिश रानी हुई हिंद में, हिंदी बाँदी

कहँ ‘ काका ‘ कविराय, ध्येय को भेजो लानत

अवसरवादी बनो, स्वार्थ की करो वक़ालत

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दहेज की बारात

Posted by Sandesh Dixit on January 17, 2009

जा दिन एक बारात को मिल्यौ निमंत्रण-पत्र

फूले-फूले हम फिरें, यत्र-तत्र-सर्वत्र

यत्र-तत्र-सर्वत्र, फरकती बोटी-बोटी

बा दिन अच्छी नाहिं लगी अपने घर रोटी

कहँ ‘काका’ कविराय, लार म्हौंड़े सों टपके

कर लड़ुअन की याद, जीभ स्याँपन सी लपके

मारग में जब है गई अपनी मोटर फ़ेल

दौरे स्टेशन, लई तीन बजे की रेल

तीन बजे की रेल, मच रही धक्कम-धक्का

दो मोटे गिर परे, पिच गये पतरे कक्का

कहँ ‘काका’ कविराय, पटक दूल्हा ने खाई

पंडितजू रह गये, चढ़ि गयौ ननुआ नाई

नीचे को करि थूथरौ, ऊपर को करि पीठ

मुर्गा बनि बैठे हमहुँ, मिली न कोऊ सीट

मिली न कोऊ सीट, भीर में बनिगौ भुरता

फारि लै गयौ कोउ हमारो आधौ कुर्ता

कहँ ‘काका’ कविराय, परिस्थिति विकट हमारी

पंडितजी रहि गये, उन्हीं पे ‘टिकस’ हमारी

फक्क-फक्क गाड़ी चलै, धक्क-धक्क जिय होय

एक पन्हैया रह गई, एक गई कहुँ खोय

एक गई कहुँ खोय, तबहिं घुस आयौ टी-टी

मांगन लाग्यौ टिकस, रेल ने मारी सीटी

कहँ ‘काका’, समझायौ पर नहिं मान्यौ भैया

छीन लै गयौ, तेरह आना तीन रुपैया

जनमासे में मच रह्यौ, ठंडाई को सोर

मिर्च और सक्कर दई, सपरेटा में घोर

सपरेटा में घोर, बराती करते हुल्लड़

स्वादि-स्वादि में खेंचि गये हम बारह कुल्हड़

कहँ ‘काका’ कविराय, पेट हो गयौ नगाड़ौ

निकरौसी के समय हमें चढ़ि आयौ जाड़ौ

बेटावारे ने कही, यही हमारी टेक

दरबज्जे पे ले लऊँ नगद पाँच सौ एक

नगद पाँच सौ एक, परेंगी तब ही भाँवर

दूल्हा करिदौ बंद, दई भीतर सौं साँकर

कहँ ‘काका’ कवि, समधी डोलें रूसे-रूसे

अर्धरात्रि है गई, पेट में कूदें मूसे

बेटीवारे ने बहुत जोरे उनके हाथ

पर बेटा के बाप ने सुनी न कोऊ बात

सुनी न कोऊ बात, बराती डोलें भूखे

पूरी-लड़ुआ छोड़, चना हू मिले न सूखे

कहँ ‘काका’ कविराय, जान आफत में आई

जम की भैन बरात, कहावत ठीक बनाई

समधी-समधी लड़ि परै, तै न भई कछु बात

चलै घरात-बरात में थप्पड़- घूँसा-लात

थप्पड़- घूँसा-लात, तमासौ देखें नारी

देख जंग को दृश्य, कँपकँपी बँधी हमारी

कहँ ‘काका’ कवि, बाँध बिस्तरा भाजे घर को

पीछे सब चल दिये, संग में लैकें वर को

मार भातई पै परी, बनिगौ वाको भात

बिना बहू के गाम कों, आई लौट बरात

आई लौट बरात, परि गयौ फंदा भारी

दरबज्जै पै खड़ीं, बरातिन की घरवारीं

कहँ काकी ललकार, लौटकें वापिस जाऔ

बिना बहू के घर में कोऊ घुसन न पाऔ

हाथ जोरि माँगी क्षमा, नीची करकें मोंछ

काकी ने पुचकारिकें, आँसू दीन्हें पोंछ

आँसू दीन्हें पोंछ, कसम बाबा की खाई

जब तक जीऊँ, बरात न जाऊँ रामदुहाई

कहँ ‘काका’ कविराय, अरे वो बेटावारे

अब तो दै दै, टी-टी वारे दाम हमारे

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