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Archive for the ‘Baba Nagarjun’ Category

यह तुम थीं

Posted by Sandesh Dixit on January 17, 2009

कर गई चाक
तिमिर का सीना
जोत की फाँक
यह तुम थीं

सिकुड़ गई रग-रग
झुलस गया अंग-अंग
बनाकर ठूँठ छोड़ गया पतझार
उलंग असगुन-सा खड़ा रहा कचनार
अचानक उमगी डालों की सन्धि में
छरहरी टहनी
पोर-पोर में गसे थे टूसे
यह तुम थीं

झुका रहा डालें फैलाकर
कगार पर खड़ा कोढ़ी गूलर
ऊपर उठ आई भादों की तलैया
जुड़ा गया बौने की छाल का रेशा-रेशा
यह तुम थीं !

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भारतीय जनकवि का प्रणाम

Posted by Sandesh Dixit on January 17, 2009

गोर्की मखीम!
श्रमशील जागरूक जग के पक्षधर असीम!
घुल चुकी है तुम्हारी आशीष
एशियाई माहौल में
दहक उठा है तभी तो इस तरह वियतनाम ।
अग्रज, तुम्हारी सौवीं वर्षगांठ पर
करता है भारतीय जनकवि तुमको प्रणाम ।

गोर्की मखीम!
विपक्षों के लेखे कुलिश-कठोर, भीम
श्रमशील जागरूक जग के पक्षधर असीम!

गोर्की मखीम!
दर-असल’सर्वहारा-गल्प’ का
तुम्हीं से हुआ था श्रीगणेश
निकला था वह आदि-काव्य
तुम्हारी ही लेखनी की नोंक से
जुझारू श्रमिकों के अभियान का…
देखे उसी बुढ़िया ने पहले-पहल
अपने आस-पास, नई पीढी के अन्दर
विश्व क्रान्ति,विश्व शान्ति, विश्व कल्याण ।
‘मां’ की प्रतिमा में तुम्ही ने तो भरे थे प्राण ।

गोर्की मखीम!
विपक्षों के लेखे कुलिश-कठोर, भीम
श्रमशील जागरूक जग के पक्षधर असीम!
गोर्की मखीम!

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जी हाँ , लिख रहा हूँ

Posted by Sandesh Dixit on January 17, 2009

जी हाँ, लिख रहा हूँ …
बहुत कुछ ! बहोत बहोत !!
ढ़ेर ढ़ेर सा लिख रहा हूँ !
मगर , आप उसे पढ़ नहीं
पाओगे … देख नहीं सकोगे
उसे आप !

दरअसल बात यह है कि
इन दिनों अपनी लिखावट
आप भी मैं कहॉ पढ़ पाता हूँ
नियोन-राड पर उभरती पंक्तियों की
तरह वो अगले कि क्षण
गुम हो जाती हैं
चेतना के ‘की-बोर्ड’ पर वो बस
दो-चार सेकेंड तक ही
टिकती है ….
कभी-कभार ही अपनी इस
लिखावट को कागज़ पर
नोट कर पता हूँ
स्पन्दनशील संवेदन की
क्षण-भंगुर लड़ियाँ
सहेजकर उन्हें और तक
पहुँचाना !
बाप रे , कितना मुश्किल है !
आप तो ‘फोर-फिगर’ मासिक -
वेतन वाले उच्च-अधिकारी ठहरे,
मन-ही-मन तो हसोंगे ही,
की भला यह भी कोई
काम हुआ , की अनाप-
शनाप ख़यालों की
महीन लफ्फाजी ही
करता चले कोई -
यह भी कोई काम हुआ भला !

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सच न बोलना

Posted by Sandesh Dixit on January 17, 2009

मलाबार के खेतिहरों को अन्न चाहिए खाने को,
डंडपाणि को लठ्ठ चाहिए बिगड़ी बात बनाने को!
जंगल में जाकर देखा, नहीं एक भी बांस दिखा!
सभी कट गए सुना, देश को पुलिस रही सबक सिखा!

जन-गण-मन अधिनायक जय हो, प्रजा विचित्र तुम्हारी है
भूख-भूख चिल्लाने वाली अशुभ अमंगलकारी है!
बंद सेल, बेगूसराय में नौजवान दो भले मरे
जगह नहीं है जेलों में, यमराज तुम्हारी मदद करे।

ख्याल करो मत जनसाधारण की रोज़ी का, रोटी का,
फाड़-फाड़ कर गला, न कब से मना कर रहा अमरीका!
बापू की प्रतिमा के आगे शंख और घड़ियाल बजे!
भुखमरों के कंकालों पर रंग-बिरंगी साज़ सजे!

ज़मींदार है, साहुकार है, बनिया है, व्योपारी है,
अंदर-अंदर विकट कसाई, बाहर खद्दरधारी है!
सब घुस आए भरा पड़ा है, भारतमाता का मंदिर
एक बार जो फिसले अगुआ, फिसल रहे हैं फिर-फिर-फिर!

छुट्टा घूमें डाकू गुंडे, छुट्टा घूमें हत्यारे,
देखो, हंटर भांज रहे हैं जस के तस ज़ालिम सारे!
जो कोई इनके खिलाफ़ अंगुली उठाएगा बोलेगा,
काल कोठरी में ही जाकर फिर वह सत्तू घोलेगा!

माताओं पर, बहिनों पर, घोड़े दौड़ाए जाते हैं!
बच्चे, बूढ़े-बाप तक न छूटते, सताए जाते हैं!
मार-पीट है, लूट-पाट है, तहस-नहस बरबादी है,
ज़ोर-जुलम है, जेल-सेल है। वाह खूब आज़ादी है!

रोज़ी-रोटी, हक की बातें जो भी मुंह पर लाएगा,
कोई भी हो, निश्चय ही वह कम्युनिस्ट कहलाएगा!
नेहरू चाहे जिन्ना, उसको माफ़ करेंगे कभी नहीं,
जेलों में ही जगह मिलेगी, जाएगा वह जहां कहीं!

सपने में भी सच न बोलना, वर्ना पकड़े जाओगे,
भैया, लखनऊ-दिल्ली पहुंचो, मेवा-मिसरी पाओगे!
माल मिलेगा रेत सको यदि गला मजूर-किसानों का,
हम मर-भुक्खों से क्या होगा, चरण गहो श्रीमानों का!

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गुलाबी चूड़ियाँ

Posted by Sandesh Dixit on January 17, 2009

प्राइवेट बस का ड्राइवर है तो क्या हुआ,

सात साल की बच्ची का पिता तो है!

सामने गियर से उपर

हुक से लटका रक्खी हैं

काँच की चार चूड़ियाँ गुलाबी

बस की रफ़्तार के मुताबिक

हिलती रहती हैं…

झुककर मैंने पूछ लिया

खा गया मानो झटका

अधेड़ उम्र का मुच्छड़ रोबीला चेहरा

आहिस्ते से बोला: हाँ सा’ब

लाख कहता हूँ नहीं मानती मुनिया

टाँगे हुए है कई दिनों से

अपनी अमानत

यहाँ अब्बा की नज़रों के सामने

मैं भी सोचता हूँ

क्या बिगाड़ती हैं चूड़ियाँ

किस ज़ुर्म पे हटा दूँ इनको यहाँ से?

और ड्राइवर ने एक नज़र मुझे देखा

और मैंने एक नज़र उसे देखा

छलक रहा था दूधिया वात्सल्य बड़ी-बड़ी आँखों में

तरलता हावी थी सीधे-साधे प्रश्न पर

और अब वे निगाहें फिर से हो गईं सड़क की ओर

और मैंने झुककर कहा -

हाँ भाई, मैं भी पिता हूँ

वो तो बस यूँ ही पूछ लिया आपसे

वर्ना किसे नहीं भाएँगी?

नन्हीं कलाइयों की गुलाबी चूड़ियाँ!

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बाबा नागार्जुन

Posted by Sandesh Dixit on January 17, 2009

Baidyanath Mishra was born in Mithila in Satlakha, his mother’s village. His native village, Tarauni, is not far away from Satlakha. He was brought up in his native village. As per the tradition of those days, the child was admitted to a Sanskrit pathshala (school). Thereafter, he studied Sanskrit at Kashi and Calcutta and obtained the degree of ‘Sahitya Acharya’ in Sanskrit. But, Baba never took up a job. He grew to become a restless traveler, a Sanskritist, classicist scholar, poet and religious rebel. He came under the spell of the anti-colonial nationalism and joined the revolutionary peasant movement led by Swami Sahajanand Saraswati. His first poem was published in Maithili in 1930 under the pen-name ‘Yatri’. His association with Rahul Sankrtyayana led him to travels to Sri Lanka and conversion to Buddhism. He became a communist at the same time and started writing in Hindi under the name ‘Nagarjun’. In fact, he was called Baba Nagarjun. From 1934 to 1941, Nagarjuna toured various parts of India and even went abroad. He was very active in journalism too during this period. Meanwhile, his first poem in Hindi was published in 1935 and he started writing under the name Nagarjun.Though always a well-known and popular poet, initially he was ignored by the conservative literary and critical establishment — till the great cultural upsurge in the Hindi-speaking areas in late 1960’s and early 1970’s turned writers like Nagarjun, Muktibodh, Shamsher Bahadur Singh and others into cult figures. His works include Baba Batesarnath, Balchanma, Ratinath ki Chachi, Patrahin Nagna Gachh, Khichri Viplav Dekha Hamne, translations of Jayadeva’s Gita Govinda, works of Kalidasa and many other classical works of Sanskrit literature. His Pratinidhi Kavitayen (a collection of representative poems, 1984) contains Hindi poems and Maithili poems. He was honoured with the Sahitya Akademi award (196 8) for his Patraheen Nagna Gaachh. He was honoured by the Sahitya Akademi, which nominated him its Fellow in 1994. In addition to that he was honoured with the Bharat Bharti award by the Uttar Pradesh Government, the Kabir Samman by the Madhya Pradesh Government and the Rajender Shikhar Award by the Bihar Government.

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