क्या यही मनुज है ?
Posted by Sandesh Dixit on January 18, 2009

अधीर अधर पर राम प्रकट है ,
व्यथा विकट या काल निकट है
सबल हाथ ,जग सकल साथ है ,
निर्बल ही को बस जग्गंनाथ है .
जीत का अब उन्माद थका है ,
थके हार कटु स्वाद चखा है .
जब तक था माया का साया ,सहज कभी तू याद न आया ,
पर जब सूर्य ढला और तुम गहराया , ह्रदय ओअत में प्रभु नाम समाया .
भक्ति का संगीत नहीं ये दुह-वक्त की चीत्कार है ,
दे शरण कर दुख हरण ये तट नहीं मंझधार है .
धन जीवन ,मन मोह बंधन ,सखा यही बस यही अनुज है ,
आजीवन संचय में मगन ,छल लोभ स्वार्थ ,क्या यही मनुज है ?
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mukesh said
nice heart touching kavita